शुक्रवार, 12 अप्रैल 2013

ब्लॉग पुरस्कार के अंतर्गत शीर्ष 10 ब्लॉग का नामांकन स्तरीय नहीं : रवीन्द्र प्रभात

डचे वेले के बोब्स ब्लॉग पुरस्कार के टॉप टेन मे नामित हिन्दी ब्लॉग के चयन पर रबिश कुमार के सिविक सेंस पर उंगली उठाई है रवीन्द्र प्रभात ने और कहा है कि यह चयन स्तरीय नहीं है । उन्होने केवल चार ब्लॉग को ही बेहतर नामित ब्लॉग माना है, बाकी छ: ब्लॉग को बकबास । यह बात उन्होने साउथ एशिया टुडे पर एक्सपर्ट कॉमेंट के अंतर्गत नाज़िया रिजवी के अङ्ग्रेज़ी में पूछे गए सवालों के जबाब में कही है । हिन्दी के पाठकों के लिए उस साक्षात्कार के मुख्य अंश का मेरे द्वारा किए गए हिन्दी में भावानुवाद आप भी पढ़िये : मनोज कुमार पाण्डेय 



साक्षात्कार के मुख्य अंश का भावानुवाद : 

आजकल विभिन्न भाषाओं के श्रेष्ठ ब्लॉग को बॉब्स अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार दिये जाने की चर्चा गर्म है । 14 भाषाओं में ऑनलाइन सक्रियता की अलग-अलग विधाओं को बढ़ावा देने के लिए जर्मनी का अंतरराष्ट्रीय ब्रॉ़डकॉस्टर "डॉयचे वेले" बेस्ट ऑफ ब्लॉग्स के तहत बॉब्स अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार देने जा रहा है। इसबार साउथ एशिया की प्रमुख भाषा हिन्दी को भी स्थान दिया गया है । हिन्दी ब्लॉग्स के अंतिम 10 के महत्वपूर्ण चयन को लेकर ज्यूरी के सदस्य टी वी एंकर रबीश कुमार की भी बड़ी आलोचना हो रही है । ऐसे में जब नाज़िया रिजवी ने हिन्दी ब्लॉगिंग के पहले इतिहासकर और न्यू मीडिया विशेषज्ञ रवीन्द्र प्रभात जी से इस विषय पर बात की तो उनका प्रतियुत्तर काफी चौंकाने वाला था । प्रस्तुत है साउथ एशिया टुडे के लिए रवीन्द्र प्रभात से एक खास मुलाक़ात :

 नाज़िया : आप हिन्दी के एकमात्र ऐसे लेखक हैं, जिन्होने हिन्दी ब्लॉगिंग की पहली मूल्यांकनपरक पुस्तक का सम्पादन किया । आपके द्वारा लिखा गया "हिन्दी ब्लॉगिंग का इतिहास" पुस्तक का कई भाषाओं में अनुवाद हो रहा है। इसलिए मैं आपसे जानना चाहूंगी कि बॉब्स अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार के अंतर्गत क्या सचमुच हिन्दी के सही ब्लॉग का चयन किया गया है ? 

 प्रभात : नहीं, कदापि नहीं । क्योंकि हिन्दी ब्लॉग के चयन हेतु जिन्हें पुरस्कार के तहत ज्यूरी का सदस्य बनाया गया है, उनमें सिविक सेंस का काफी अभाव है । कुएं के मेढक की तरह उन्हें नियुज रूम में होने वाली चर्चाएं ही सही और सार्थक लगती है । चयन में रबीश का भेदभावपूर्ण कृत्य साफ दिख रहा है ।

 नाज़िया : किस-किस ब्लॉग के चयन पर आपको आपत्ति है ? 

प्रभात : किसी ब्लॉग का नाम लेकर उसकी आलोचना करना उचित नहीं होगा। हाँ मेरी समझ से कुछ अच्छे ब्लॉग को इसमें शामिल अवश्य किया जाना चाहिए था । मसलन प्रभात रंजन का जानकी पूल, डॉ अरविंद मिश्रा का साई ब्लॉग, ललित कुमार का दशमलव, अविनाश वाचस्पति का नुक्कड़, रवि रतलामी का छींटे और बौछारें, रणधीर सिंह सुमन का लोकसंघर्ष, दिनेश राय द्विवेदी का तीसरा खंभा, रेखा श्रीवास्तव का मेरा सरोकार आदि । 

नाज़िया: तो इसका मतलब यह है कि नामित किया गया कोई ब्लॉग आपकी नज़रों में स्तरीय नहीं है ? प्रभात : नहीं, मैंने ऐसा तो नहीं कहा । मेरी नज़रों में एक-दो ब्लॉग अवश्य है जिसके चयन पर आपत्ति नहीं की जा सकती । नाज़िया : मसलन ?

 प्रभात : मसलन तस्लीम । क्योंकि इस ब्लॉग का चयन निराश नहीं करता । यह वाकई नामित होने योग्य ब्लॉग है और मेरी शुभकामनायें है इस ब्लॉग के साथ। 

 नाज़िया : तस्लीम ही क्यों, कोई और क्यों नहीं ? 

प्रभात : मेरा आशय यह नहीं है कि केवल तस्लीम ही बेहतर ब्लॉग है । कुछ और भी ब्लॉग है इस चयन में जिसे मैं तस्लीम के बाद वोट करने लायक मानता हूँ । जैसे - सर्प संसार, चोखेर वाली, मोहल्ला लाइव आदि । 

नाज़िया : इस समय जो वोट की स्थिति है, उसके आधार पर तस्लीम और नारी ब्लॉग अग्रणी है । ऐसे में आपकी प्राथमिकता क्या है ? 

प्रभात : देखिये तस्लीम एक विज्ञान ब्लॉग है, जो अंधविश्वास के खिलाफ अपनी मुहिम को तर्कसंगत तरीके से रखता है । इसलिए मैं उसे पसंद करता हूँ । जहां तक नारी ब्लॉग का प्रश्न है तो मैं स्पष्ट रूप से यह कहना चाहूँगा कि उसमें ब्लॉगिंग सेंस है ही नहीं । वहाँ नकारात्मक बातों को ज्यादा महत्व दिया जाता है । उसे पढ़ने के लिए पर्मिशन लेनी पड़ती है । यानि कि सार्वजनिक ब्लॉग की श्रेणी में है ही नहीं नारी ब्लॉग । फिर सर्वश्रेष्ठ ब्लॉग की श्रेणी में नामित करने का क्या मतलब था ? 

 नाज़िया : एक अहम सवाल आपसे, कि इऩ पुरस्कारों के लिए ब्लॉग्स प्रस्तावित करने की डेढ़ महीने से ज़्यादा चली प्रक्रिया अब पूरी हो चुकी है। अब इनमें जूरी ने चुनींदा ब्लॉग्स को नामांकित भी कर दिया है । 3 अप्रैल से लेकर आने वाले पांच हफ्तों तक आप अपने पसंदीदा ब्लॉग के लिए वोट कर सकते हैं और उसे विजेता बना सकते हैं। यह प्रक्रिया आपको कितनी विश्वसनीय लगती है ?

प्रभात : इस संदर्भ मे अभी कुछ नहीं कहा जा सकता, परिणाम आने के बाद ही कुछ कहा जा सकता है । 

 नाज़िया : जी बहुत-बहुत शुक्रिया आपका इस विषय पर अपनी बेवाक राय के लिए । 

प्रभात : आपका भी धन्यवाद । 


(कुछ महत्वपूर्ण और संशोधित अंश का भावानुवाद मेरे द्वारा : मनोज कुमार पाण्डेय )

13 टिप्‍पणियां:

अर्शिया अली ने कहा…

तस्‍लीम की चर्चा देख कर प्रसन्‍नता हुई।

Arvind Mishra ने कहा…

रवींद्र प्रभात जी ब्लॉग हिस्टोरियन हैं उनकी बातों में बल है -मगर ऐसी भाव निष्ठता तो बनी ही रहेगी! अंगरेजी इंटरव्यू में रवींद्र जी ने साईब्लाग का नाम लिया -आभार कहना बनता है!

नुक्‍कड़ ने कहा…

मेढ़कों को खुली दुनिया की सैर कराना आज की जरुरत है,,,।

नुक्‍कड़ ने कहा…

मेढ़कों को खुली दुनिया की सैर कराना आज की जरुरत है,,,।

डॉ शिखा कौशिक ''नूतन '' ने कहा…

सार्थक प्रस्तुति . हार्दिक आभार नवसंवत्सर की बहुत बहुत शुभकामनायें हम हिंदी चिट्ठाकार हैं

BHARTIY NARI
PLEASE VISIT .

शारदा अरोरा ने कहा…

प्रुस्कारों की बात होते ही राजनीति शुरू हो जाती है ...आदर्श ब्लॉगस के चयन में निष्पक्षता बरती जानी चाहिए और माप-दंड बिलकुल साफ़ होने चाहिए ...उद्देश्य ,सार्थक लेखन ...न कि पब्लिसिटी ..वो तो हथकंडों से भी अपनाई जा सकती है ...इसलिए फैसला सर्वमान्य व सर्व के हित में होना चाहिए ...

S.M Masum ने कहा…

अब तो कही जा कर ब्लॉगजगत का सवेरा हुआ है क्यों फिर से अधकार की और ले जाना चाहते हैं |

DrZakir Ali Rajnish ने कहा…

बडा धांसू इंटरव्‍यू है। नि:संदेह इसे पढकर कइयों के कलेजे पर सांप लोट जाएंगे।

संतोष त्रिवेदी ने कहा…

बढ़िया और तार्किक बातें कही हैं प्रभात जी ने।

काजल कुमार Kajal Kumar ने कहा…

1. पंजाब में आतंकवाद के दिनों एक चुटकुला मशहूर था कि जरनैल सिंह भिंडरवाल किसी को भी बुला कर कहता था कि जिस किसी को तुम पंथविरोघी समझते हो उसका नाम पर्ची पर लिख कर फलां मटके में डाल दो- 'हम रोज़ मटके से एक-एक पर्ची निकाल कर उन्हें उड़ाते रहते हैं.' अगर वह आदमी आनाकानी करे तो वो कहता था कि -'चलो ठीक है, किसी आैर का नाम याद नहीं आ रहा तो अपना नाम पर्ची पर लिख कर मटके में डाल जाआे.'

मुझे लगता है कि ब्लागों के लिए ईनाम देने वालों को भिंडरांवाले से चयनप्रक्रिया पर सबक लेना चाहिए कि जिसकी पर्ची निकले उसे ईनाम थमा दो. घर-घर जाकर वोट मांगने से लोगों को पीछा छूटेगा.

2. कई साल पहले जब दूरदर्शन पर नई हवा बहने लगी तो आकाशवाणी के कई लोग जुगाड़बाज़ी बैठा कर दूरदर्शन में सैट हो गए क्यों कि उसमें ग्लैमर था/है. इसमें IIS के भी कई बाबू लोग थे जिनके नाम समाचार-बुलेटिन-संपादक बगैहरा के रूप में वहां टी.वी. पर दिखाए जाते थे, जबकि रेडियो पर वे गुमनाम रहते थे.

ये लोग social hierarchy में अपने आपको रेडियो वालों से ऊपर मानते थे. एेसे ही एक सज्ज्न एक दिन हिंदी न्यूज़रूम में आए तो उस समय के वरिष्ठ हिंदी समाचारवाचक जयनारायण शर्मा ने लगभग सभी को सुनाते हुए कहा था कि आआे भई *डू कैसे हो ? जब वह व्यक्ति अवाक् रह गया तो अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने विस्तार से बताया कि कैसे दूरदर्शन तक पहुंचने के लिए बहुत *ड मरानी पड़ती है, इन्होंने भी बहुत मराई है, मेरी न मानो तो इन्हीं से पूछ लो.

कभी कभी लगता है कि कुछ ईनाम तो होते ही एेसे हैं कि जिन्हें पाने के लिए तो रास्ता आकाशवाणी से दूरदर्शन वाला ही है. जिस पर बिरले ही चल पाते हैं.

मनोज पाण्डेय ने कहा…

मासूम जी,
रवीन्द्र जी ने बिलकुल सही कहा है कि शीर्ष-10 का चयन स्तरीय नहीं है । आप ही बताइये इस चयन में हलाल मीट और नारी ब्लॉग के चयन का क्या मतलब है?

गांधी के इस देश में हलाल मीट को महत्व देकर क्या आप हिंसा को महत्व नहीं दे रहे हैं ? नारी ब्लॉग सर्वश्रेष्ठ ब्लॉग के रूप में नामित किया गया है जिसे पढ़ने के लिए पर्मिशन लेनी पड़ती है, यानि सार्वजनिक है ही नहीं यह ब्लॉग । जो सार्वजनिक नहीं है उसे श्रेष्ठता क्रम में नामांकित कर दिया गया ? और भी कई उदाहरण है । मैं तो रवीद्र जी से सहमत हूँ । अप भी दाबी जुबान से ही सही सहमत अवश्य होंगे मेरी बातों से ।

शिवम् मिश्रा ने कहा…

आज की ब्लॉग बुलेटिन जलियाँवाला बाग़ की यादें - ब्लॉग जगत के विवाद - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

anji ने कहा…

It's weekend and you are facing shortage of pocket money. Please fullfil your dreams by visiting StuCred Website